कब लोगे खबर भोलेनाथ बड़ी देर भयी बड़ी देर भयी …

स्वयं महादेव के बताये अनुसार इन दस शैवव्रत में से, ये 4 व्रत मनुष्य को मोक्ष प्रदान करते है …

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सावन में शिव भक्तों की हर-हर महादेव, बम-बम भोले, जय शिव शंभू की पवित्र गूंजों से हर शिवालय गूंज उठता है। इस अवसर पर देवाधिदेव महादेव की उपासना, व्रत एवं संकल्प के द्वारा आत्मबोध की झलक-झांकी पाने का प्रयास किया जाता है। यह साधना का परम दुर्लभ योग है, जिसमें उपवास और उपासना करने वाले पर महादेव महाकाल की कृपा बरसती है। भगवान भूतनाथ उस पर ही प्रसन्न होते हैं। सदाशिव महामृत्यंजय उसका परमकल्याण करते हैं।

शिवरात्रि अर्थात भगवान् शिव की आराधना अभ्यर्थना की रात्रि। प्रत्येक माह के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मास शिवरात्रि कहते हैं और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहते हैं। महाशिवरात्रि को महादेव से मिलन की रात्रि है। इसमें आत्मा का मंगलकारी शिव से मिलन संयोग होता है। भोलेनाथ के संग सुवास में इस मिलन की महत्ता और भी बढ़ जाती है।

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शिवरात्रि बोधोत्सव है, ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव के अंश हैं, हम भी शिव अर्थात कल्याणकारी हैं। महाशिवरात्रि उपदेश देती है कि हम जीव को शिव मानकर उसकी सेवा करें। जीवन में श्रेष्ठ व मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को दोहराने व अपनाने की प्रेरणा प्रदान करती है महाशिवरात्रि। नव चेतना का संचार करने, हर साल आती है महाशिवरात्रि।

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भारतीय जीवन धारा में आत्मबोध का स्वर सदा से है और सर्वत्र मुखर रहा है। उपनिषदों की विचार भूमि से भी यही अमृतोपम विचार उद्घोषित हो रहा है- आत्मानं विद्धिः अर्थात् संसार को जानने के साथ-साथ स्वयं को भी पहचानो। बिना आत्मज्ञान के मानव जीवन की सच्ची सार्थकता सिद्धि नहीं हो सकती है।

महाशिवरात्रि के गूढ़ उद्देश्य को समझने और जानने के लिए माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से पूछा- है भगवन्! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के हेतु आप हो। साधकों की साधना से संतुष्ट होकर आप ही वर प्रदान करते हो। अतः यह जानने की इच्छा होती है कि किस प्रकार के कर्म, किस व्रत या किस प्रकार की तपस्या से तुम प्रसन्न होते हो? इसके उत्तर में प्रभु ने कहा-

फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथिः स्याच्चतुर्दशी।
तस्यां या तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका।।
तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां धु्रवम्।
न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया।।
तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः॥

फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का आश्रय लेकर जिस अंधकारमयी रजनी का उदय होता है, उसे महाशिवरात्रि कहते है। उस दिन जो उपवास करता है, वह निश्चय ही मुझे संतुष्ट करता है। शिवपुराण में शिव सूत जी के संवाद का उल्लेख मिलता है। शिवजी से सूत जी ने पूछा- ‘हे भगवन्! जिस व्रत के अनुष्ठान से भक्तजनों को भोग और मोक्ष की प्राप्ति हो सके, उसका आप विशेष रूप से वर्णन करें।’

यही प्रश्न ब्रह्मा, विष्णु तथा माता पार्वती ने भी शिवजी से पूछा था। इसके जवाब में शिवजी कहते हैं- ‘‘मेरे बहुत से व्रत हैं जो भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। उनमें मुख्य दस व्रत हैं- जिन्हें जाबाल श्रुति के विद्वान ‘दस शैवव्रत’ कहते हैं।’’ मुक्तिमार्ग में प्रवीण पुरुषों को मोक्ष की प्राप्ती करानेवाले चार व्रतों का नियमपूर्वक पालन करना चाहिए। यह चार व्रत है- शिवजी की पूजा, रुद्र मंत्रों का जप, शिव मंदिर में उपवास तथा काशी में रमण। यह मोक्ष के सनातन मार्ग हैं। यहां पर काशीतीर्थ मात्र भौतिक स्थान से संबंधित नही, बल्कि अपने साथ एक आध्यात्मिक रहस्य को सजोए हैं।

भगवान् भोलेनाथ आगे कहते है कि इन चारों में भी महाशिवरात्रि का व्रत अपने में सबसे अधिक महत्ता और विशेषता को समेटे हुए है। अतः भोग और मोक्ष रूपी फल की इच्छा रखने वाले लोगों को मुख्यतः इस महाव्रत का पालन करना चाहिए। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सभी के लिए यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है। शिवरात्रि घोर पाप-संताप और संकटो से मुक्तिदायिनी है। इस व्रत का भक्तिपूर्वक पालन करने से उपासक के समस्त दुःखों का नाश होता है और उसे भोग, मोक्ष आदि संपूर्ण मनोवांछित फलों की उपलब्धि होती है।

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नागपंचमी 2018 – नागराज की पूजा करने से मिलेगी कालसर्प दोष से मुक्ति …

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नाग पंचमी – Nag Panchami 2018

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। जहां सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को उत्तर भारत में नाग पूजा की जाती है, वहीं दक्षिण भारत में एेसा ही पर्व कृष्ण पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में नाग पंचमी का अत्यंत महत्व माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार इस दिन सर्पों के 12 स्वरूपों की पूजा की जाती है। और दूध चढ़ाया जाता है। भगवान शिव को सर्प अत्यंत प्रिय हैं इसीलिए उनके प्रिय माह सावन में नाग पंचमी का त्योहार आता है जिसे श्रद्घा पूर्वक विधि विधान से मनाने पर भोलेनाथ प्रसन्न हो कर अपनी कृपा बरसाते हैं।

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नागपंचमी की पौराणिक कथाएं

भविष्य पुराण के अनुसार सावन महीने की पंचमी नाग देवता को समर्पित है यही कारण है कि इसे नागपंचमी कहते हैं पौराणिक कथा के अनुसार सावन महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी को भगवान श्री कृष्ण ने वृदांवन में नाग को हराकर लोगों का जीवन बचा लिया था श्री कृष्ण भगवान ने सांप के फन पर नृत्य किया, जिसके बाद वह नथैया कहलाये, एक और पौराणिक कथा भी है जिसके अनुसार इस दिन सृष्टि रचयिता ब्रह्रमा जी ने अपनी कृपा से शेषनाग को अलंकृत किया था पृथ्वी का भार धारण करने के बाद लोगों ने नाग देवता की पूजा करनी शुरू कर दी, तभी से यह परंपरा चली आ रही है|

नागपंचमी पूजन और सर्पदोष से मुक्ति

मान्यताओं के अनुसार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को नागपंचमी के दिन व्रत भी रखा जाता है, व्रत के बारे में गरूण पुराण में लिखा है कि व्रत रखने वाले को मिट्टी या आटे के सांप बनाकर उन्हें अलग-अलग रंगो से सजाना चाहिए, सजाने के बाद फूल, खीर, दूध, दीप आदि से उनकी पूजा करें, क्योंकि नाग देवता को पंचम तिथि का स्वामी माना जाता है पूजा के बाद भुने हुये चने और जौ को प्रसाद के रूप में बांट दें|

जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष है उन लोगों को इस दिन नाग देवता की पूजा करनी चाहिए, इस दिन पूजा करने से कुंडली का यह दोष समाप्त होता है |

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नाग पंचमी व्रत विधान

नाग पंचमी सावन की शुक्ल पंचमी को मनाई जाती हैं, उस समय कई लोग सावन के व्रत करते हैं. जिसमें कई लोग धन धान्य की ईच्छा से नाग पंचमी का व्रत करते हैं. इस दिन नाग देवता के मंदिर में श्री फल चढ़ाया जाता हैं. ‘ॐ कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा’ श्लोक का उच्चारण कर सर्प का जहर उतारा जाता हैं, और सर्प के प्रकोप से बचने के लिए नाग पंचमी की पूजा की जाती हैं |

नागपंचमी पर नाग पूजन के मंत्र 

मंत्र 1 – ॐ भुजंगेशाय विद्महे, सर्पराजाय धीमहि, तन्नो नाग: प्रचोदयात्।।

मंत्र 2 – ‘सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले। ये च हेलिमरीचिस्था ये न्तरे दिवि संस्थिता:।। ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:। ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।’

अर्थात् – संपूर्ण आकाश, पृथ्वी, स्वर्ग, सरोवर-तालाबों, नल-कूप, सूर्य किरणें आदि जहां-जहां भी नाग देवता विराजमान है। वे सभी हमारे दुखों को दूर कर हमें सुख-शांतिपूर्वक जीवन दें। उन सभी को हमारी ओर से बारम्बार प्रणाम है | 

नागपंचमी पूजा 2018 का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष नाग पंचमी का त्योहार 15 अगस्त को मनाया जाएगा। इस बार नाग पंचमी हस्त नक्षत्र और साध्य योग में पड़ रही है, जो कि अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 48 मिनट से सांयकाल 04 बज कर 13 मिनट तक है। इस दिन जो लोग नाग पूजा और काल सर्प योग की साधना आदि करते हैं वे अपनी पूजा प्रातः 11 बज कर 48 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 32 मिनट के मध्य कर लें। ये सर्प पूजा का सबसे शुभ काल है।

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ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय हर हर बोले नमः शिवाय धुन …

शनिवार 11 अगस्त को सूर्य ग्रहण और शनैश्चरी अमावस्या का महासंयोग, ऐसे पाएं शनि दोष से मुक्ति

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सूर्य ग्रहण और शनैश्चरी अमावस्या का महासंयोग

इस साल 11 अगस्त को शनिवार के दिन अमावस्या होने से यह शनैश्चरी अमावस्या कहलाएगी। इस दिन सूर्य ग्रहण भी लगने जा रहा है। हमारे शास्त्रों में शनैश्चरी अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है। इस पर सूर्य ग्रहण होने से शनि और पितृ दोषों से मुक्ति के लिए इन उपायों को आजमाएं।

ऐसे मिलेगी शनिदेव की कृपा

शनैश्चरी अमावस्या के दिन शास्त्रों में बताए गए उपायों को करने से शनि की साढ़ेसाती आदि के प्रभाव कम होते हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि आप इस दिन शनि के बीज मंत्र ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:’ या सामान्य मंत्र ‘ॐ शं शनैश्चराय नम:’ का जप करें और इसके बाद उड़द दाल की खिचड़ी या तिल के तेल से बने पकवान दान करें हैं तो शनि और पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है।

पीपल के पेड़ का बड़ा महत्व

शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे काली बाती बनाकर सरसों तेल का दीप जलाएं। पीपल को जल और काली चिंटियों गुड़ दें तो शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है। पीपल के पत्तों पर मिठाई रखकर पितरों का ध्यान करें तो पितृदोष भी दूर होता है।

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शमी पेड़ की करें पूजा

ऐसी मान्यता है कि शनि दोष से मुक्ति के लिए शनिवार के दिन चमड़े के जूते चप्पल दान करना भी अच्छा रहता है। इसके साथ आप शमी के पेड़ की भी पूजा कर सकते हैं।इस दिन लगने वाला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा इसलिए इस दिन घर में शमी का पेड़ लगाना भी शुभ फलदायी रहेगा।

हनुमानजी की उपासना से होता लाभ

महाबलि हनुमानजी की स्तुति से भी लाभ मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, हनुमानजी ने शनिदेव को लंकापति रावण की कैद से मुक्त कराया था। ऐसे में लगातार कैद में रहने से उन्हें काफी पीड़ा हो रही थी तो हनुमानजी ने उनके शरीर पर तेल का लेप लगाया, जिससे शनिदेव को काफी राहत मिली। इसलिए हनुमानजी की पूजा करने से शनि दोष से हो रही पीड़ा से भी शांति मिलती है। तभी से शनिवार के दिन तेल चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। इसके साथ ही ऐसा माना जाता है कि हनुमानजी के भक्तों को शनिदेव की कुदृष्टि कभी नहीं झेलनी पड़ती है।

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शनि दोष के कष्ट से पाएं मुक्ति

अमावस्या की रात को 8 बादाम व 8 काजल की डिब्बी एक काले वस्त्र में बांधकर मंदिर के पास किसी संदूक में रख देते हैं तो उससे शनिदेव प्रसन्न होकर ढैय्या और साढ़ेसाती से मुक्ति प्रदान करते हैं इस तरह के उपाय लाल किताब में बताए गए हैं। । इसके अलावा शनिवार के दिन काली गाय की सेवा करने से भी लाभ होता है। उसे रोटी खिलाएं और माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं।

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ऐसे करें पीपल के पेड़ का पूजन

शनैश्चरी अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और इसे जरूरतमंदों में बांट दें इससे ग्रहण का दान और शनि के उपाय दोनों हो जाएंगे। इस उपाय से शनि के साथ पितृगण भी खुश होंगे।

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